Wednesday, November 6, 2013

अपना जीवन सभी को प्रिय होता है , फिर जीवन में अगर सफलता मिल जाये तो यह और भी सुख दायक हो जाता है । लेकिन क्या कारण है कि कुछ सफलताओं के बावजूद हमें एक अवसाद जीवन में बना ही रहता है , कुछ दुःख बना ही रहता है । एक अतृप्त प्यास हर समय सफलता रूपी घड़े को तलाशती रहती है । निराशा बोध एक के बाद एक नयी परेशानियाँ पैदा करता ही रहता है । सृजन छमताओं का ह्रास। समय का अबाध गति के साथ बढ़ना और हमारा समय को एक और मौका देना कि वो हमारी चेतना के कुछ लम्हें चुरा ले ,असफलता का दरवाजा खोलने जैसा है । नियोजन व् एक लक्ष्यता सफल होने के एक मात्र सूत्र है । हमारी चेतना की बहुत सारी  ऊर्जा इस में खर्च हो जाती है कि दूसरे क्या कर रहें है अथवा दूसरे क्या कहेंगे | यदि हम इस कार्य को अपने  ढंग से नियोजित  करेंगे तो क्या होगा  ? भटकन ही  असफलता का दूसरा कारण है । एक मिनट ठहरें और सोंचें कि क्या हम सही मार्ग पर जा रहें हैं ? क्या हमने सही रास्ता चुना है ? क्या भटकाव कि स्थिति में कोई मार्ग दर्शक है हमारे साथ ? ये वो प्र्शन हैं जो सदा हमारे साथ रहने  चाहिए ।